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मायका और बेटियां

खिडकी के पास खड़ी सिमरन सोचती हैं, राखी आने वाली है, पर इस बार न तो माँ ने फोन करके भैया के आने की बात कही और न ही मुझे आने को बोला। ऐसा कैसे हो सकता है…? हे भगवान बस ठीक हो सब कुछ।

वह अपनी सास से बोली – माँ जी मुझे बहुत डर लग रहा है। पता नहीं क्या हो गया? मुझे कैसे भूल गए इस बार?

आगे से सास बोली – कोई बात नही बेटा, तुम एक बार खुद जा कर देख आओ। सास की आज्ञा मिलने भर की देर थी, सिमरन अपने पति साथ मायके आती हैं। परंतु इस बार घर के अंदर कदम रखते ही, उसे सब कुछ बदला सा महसूस होता है। पहले जहाँ उसे देखते ही माँ पिताजी के चेहरे खुशी से खिल उठते थे, इस बार उन पर परेशानी की झलक साफ दिखाई दे रही थी। आगे भाभी उसे देखते ही दौडी चली आती और प्यार से गले लगा लेती थी, पर इस बार दूर से ही एक हल्की सी मुस्कान दे डाली। भैया भी ज्यादा खुश नही थे। सिमरन ने जैसे तैसे एक रात बिताई।

परन्तु अगले दिन जैसे ही उसके पति उसे मायके छोड़ वापिस गये, तो उसने अपनी माँ से बात की। तो उन्होंने बताया, इस बार कोरोना के चलते भैया का काम बिल्कुल बंद हो गया। ऊपर से और भी बहुत कुछ। बस इसी वजह से तेरे भैया को, तेरे घर भी न भेज सकी।

सिमरन बोली – कोई बात नहीं माँ। ये मुश्किल दिन भी जल्दी निकल जाएँगे। आप चिंता न करो। शाम को भैया भाभी आपस में बात कर रहे थे, जो सिमरन ने सुन ली।

भैया बोले – पहले ही घर चलाना इतना मुश्किल हो रहा था, ऊपर से बेटे की कॉलेज की फीस, परसो राखी है, सिमरन को भी कुछ देना पड़ेगा।

आगे से भाभी बोली – कोई बात नहीं। आप चिंता न करो। ये मेरी चूड़ियां बहुत पुरानी हो गई हैं।इन्हें बेच कर जो पैसे आएंगे, उससे सिमरन दीदी को त्योहार भी दे देंगे और कॉलेज की फीस भी भर देंगे।

सिमरन को यह सब सुन कर बहुत बुरा लगा। वह मन ही मन बोली, भैया भाभी ये आप दोनों क्या कह रहे हो? क्या मैं आपको यहां तंग करके, कुछ लेने के लिए ही आती हुँ?

वह अपने कमरे में आ जाती हैं। तभी उसे याद आता है, अपनी शादी से कुछ समय पहले, जब वह नौकरी करती थी, तो बड़े शौक से अपनी पहली तनख्वाह ला कर पापा को दी, तो पापा ने कहा, अपने पास ही रख ले बेटा, मुश्किल वक़्त में, ये पैसे काम आएंगे।

इसके बाद वह हर महीने अपनी सारी तनख्वाह बैंक में जमा करवा देती। शादी के बाद जब भी मायके आती, तो माँ उसे पैसे निकलवाने को कहती, पर सिमरन हर बार कहती, अभी मुझे जरूरत नही, पर आज उन पैसों की उसके परिवार को जरुरत है।

वह अगले दिन ही सुबह भतीजे को साथ लेकर बैंक जाती है और सारे पैसे निकलवा, पहले भतीजे की कॉलेज की फीस जमा करवाती है और फिर घर का जरूरी सामान खरीद, घर वापस आती है।

अगले दिन जब भैया के राखी बांधती है, तो भैया भरी आँखी से उसके हाथ सौ का नोट रखते है।सिमरन मना करने लगती है, तो भैया बोले, ये तो शगुन है पगली मना मत करना।

सिमरन बोली – भैया बेटियां मायके शगुन के नाम पर कुछ लेने नही, बल्कि अपने माँ बाप की अच्छी सेहत की कामना करने, भैया भाभी को माँ बाप की सेवा करते देख ढेरों दुआएं देने, बडे होते भतीजे भतीजियो की नजर उतारने आती हैं। जितनी बार मायके की दहलीज पार करती हैं, ईश्वर से उस दहलीज की सलामती की दुआएं माँगती हैं। जब मुझे देख माँ पापा के चेहरे पर रौनक आ जाती हैं, भाभी दौड़ कर गले लगाती है, आप लाड़ लड़ाते हो, मुझे मेरा शगुन मिल जाता हैं।

अगले दिन सिमरन मायके से विदा लेकर ससुराल जाने के लिए जैसे ही दहलीज पार करती हैं, तो भैया का फोन बजता है।उन्हें अपने व्यापार के लिए बहुत बड़ा आर्डर मिलता है और वे सोचते है, सचमुच बहनें कुछ लेने नही, बल्कि बहुत कुछ देने आती हैं मायके और उनकी आंखों से खुशी के आंसू बहने लगते है।

सचमुच बहन बेटियाँ मायके कुछ लेने नही बल्कि अपनी बेश कीमती दुआएं देने आती हैं। जब वे घर की दहलीज पार कर अंदर आती हैं, तो बरक़त भी अपने आप चली आती हैं।

हर बहन बेटी के दिल की तमन्ना होती हैं, कि उनका मायका हमेशा खुशहाल रहे और तरक्की करे। मायके की खुशहाली देख उनके अंदर एक अलग ही ताकत भर जाती हैं, जिससे ससुराल में आने वाली मुश्किलो का डट कर सामना कर पाती है।

त्योहार का अर्थ है परिवार और हमें जानने वालों की खुशियॉं , समय और हालात एक से नहीं रहते ।

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